शनिवार, 10 अप्रैल 2010

गज़ल

आप अपने को जानता भी नही
जैसे ख़ुद से तो राबता ही नहीं

रात दिन खोया खोया रहता है
और कहने को लापता भी नहीं

है खबर उसको सारी दुनिया की
अपने बारे में कुछ पता भी नहीं

उसने की यूं गुनाह से तौबा
जैसे उसकी कोई ख़ता भी नहीं

सुन के आंगन में आहटें ‘गुलशन’
क्या अजब है मैं चौंकता भी नहीं
                       --गुलशन मदान

4 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी प्रस्तुति। बधाई। ब्लॉगजगत में स्वागत।

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  2. इस नए चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  3. कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

    धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

    कलम के पुजारी अगर सो गये तो

    ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ , साथ हीं जनोक्ति द्वारा संचालित एग्रीगेटर " ब्लॉग समाचार " http://janokti.feedcluster.com/ से भी अपने ब्लॉग को अवश्य जोड़ें .

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