शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

किनारा कर गया

क्या अजब ये हाल मेरा, ग़म तुम्हारा कर गया
इस भरी दुनिया में मुझको बेसहारा कर गया

साथ रहना था तुझे तो इस अज़ल के बाद भी
तू तो मेरी ज़िन्दगी से ही किनारा कर गया

वह समन्दर के ख़ज़ाने से भी नावाक़िफ़ रहा
साहिलों से जो समन्दर का नज़ारा कर गया

उसके हाथों में न जाने किस तरह का था हुनर
इस तरह छुआ कि ज़र्रे को सितारा कर गया ॥
                                    
                                                           -गुलशन मदान

रविवार, 20 जून 2010

सुनसान क्यूं है

प्रिय पाठको
आज आपके लिए गज़लकार ''ईश्वर चंद गर्ग'' की एक रचना (सही देखने के लिए रचना पर एक चटका लगायें):-

रविवार, 6 जून 2010

बना गया कोई

मेरी दुनिया से चला गया कोई
जख्म दिल पे बना गया कोई |

नींद उड़ गई चैन जाता रहा 
हाले-दिल ऐसा बना गया कोई |

मैं बेबस ,वह भी मजबूर है 
दोनों को लाचार बना गया कोई | 

इश्क क़ुर्बानी पे आ पहुंचा 
कैसी ये पट्टी पढ़ा गया कोई |

क्या किसी से शिकवा करूँ 
लाइलाज रोग लगा गया कोई ||
    
             -ललित कुमार "दिलकश"  

मंगलवार, 1 जून 2010

बडी होती लडकी

अम्मा
क्या तुमने
कभी घ्यान से देखा है
गुडिया से बिटिया
और बिटिया से
लडकी
और लडकी से
औरत होने की और
बढती अपनी लाडो को

अम्मा
तुम्हारी लाडो तो
सदा से ही
मर मर कर
जीती रही है
मां-बापू के घर में
भाई के लिए
फिर पति के लिए
सास ससुर के लिए
अपने बच्चों के लिए
उसे कब
नसीब हो पाते हैं
लाडो रहने के क्षण

अम्मा
मत दोहराना इतिहास
अपनी लाडो को
रहने देना
लाडो बिटिया लडकी
ताकि वह
बस जी सके
और जीवन रस पी सके।
              
                  -प्रद्युम्न भल्ला

सोमवार, 24 मई 2010

ऐतबार की बातें

रंग, खुशबू, बहार की बातें
कीजिए कुछ तो प्यार की बातें ।

उम्र काटी है बेकरारी में
अब तो कीजे करार की बातें ।

आ भी जाओ कि हो चुकी है बहुत
आपके इन्तज़ार की बातें ।

झूठी बातों से दिल नहीं लगता
कुछ करो ऐतबार की बातें ।

बज़्म में देर तक हुई कल तो
हुस्न की और प्यार की बातें ।

ज़िक्रे-‘गुलशन’ हुआ तो होंगी ही
फूल के साथ ख़ार की बातें ।

         -गुलशन मदान

शनिवार, 22 मई 2010

आतंकवाद

बम बारूद और बन्दूक
सोचकर ही
हैरान-सा हो जाता हूँ
लेकिन वह
जो हर रोज
इनके साथ रहता है
अपना जीवन जीता है
कैसे जीता होगा
अँधेरा, अंत और आतंक
जिसके सहचर हैं
दुनिया की मानवता
जिसका निशाना बनी है
जो अंत और आतंक के लिए
अंधेरे का सहारा लेकर
बम, बारूद और बन्दूक के साथ
लालिमा को अपना लक्ष्य बनाकर
आचरण करता है
क्या नाम दूँ उसे
मुल्ला उमर, मसूद अजहर
या फिर
ओसामा-बिन-लादेन
पर , हाँ
जगत उसको
आतंकवाद का नाम देता है॥

-दिनेश शर्मा 

मंगलवार, 11 मई 2010

आ अब लौट चले

मुअन जोदडो से प्राप्त
सिंधु घाटी के अवशेष
मिट्टी की गाडी
कांसे के बर्तन
आभूषण और औजार
जैसी हजारों वस्तुएं
पर
कोई हथियार न मिलना
सिद्ध करता है
शासन की स्वच्छता
तानाशाही का अभाव
सभ्य ,अनुशासित जीवन
एक समृद्ध संस्कृति को
जो आमन्त्रित करती है हमें
छोडकर ऎसी आधुनिकता को
जहाँ है खून-खराबा
हर ओर शोर-शराबा
सब ओर
हर मोड पर
यमराज नजर आता
आदमियों के अथाह समन्दर में
नहीं इन्सान नजर आता
चल लौट चलें
उस और चलें
आ लौट चलें।

 :- दिनेश शर्मा